🔱"परम वीर चक्र"

पराक्रम की पराकाष्ठा, बलिदान की अमर कथा!"

🏅 राष्ट्र रक्षा का सर्वोच्च गौरव"

परमवीर चक्र भारत का सर्वोच्च सैन्य वीरता पुरस्कार है, जो शत्रु के विरुद्ध युद्ध क्षेत्र में अद्वितीय साहस, पराक्रम और आत्मबलिदान का परिचय देने वाले सैन्य कर्मियों को प्रदान किया जाता है। यह अलंकरण केवल जीवित सैनिकों को ही नहीं, अपितु वीरगति को प्राप्त हुए सैनिकों को भी मरणोपरांत प्रदान किया जाता है। यह सम्मान भारतीय सशस्त्र बलों के सभी अंगों — थल सेना, नौसेना और वायुसेना — के सैनिकों के लिए समान रूप से मान्य है।

इस सम्मान की स्थापना भारत सरकार द्वारा स्वतंत्रता के पश्चात् की गई थी। इसे औपचारिक रूप से दिनांक २६ जनवरी १९५० को, भारत के गणतंत्र बनने के साथ ही, तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा घोषित किया गया था। परमवीर चक्र का आरंभिक उद्देश्य भारतीय सैन्य परंपरा में सर्वोच्च वीरता की भावना को सम्मानित करना था, जो राष्ट्र के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले सैनिकों की गाथा को अमर करता है।

परमवीर चक्र का डिज़ाइन चार कमलों के मध्य स्थित एक वज्र पर आधारित है, जिसे पौराणिक योद्धा इन्द्र के वज्र से प्रेरित माना जाता है। इस वज्र के मध्य में एक वृत्त है, जिसमें दो तलवारें क्रॉस की हुई होती हैं। यह चिह्न संकल्प, शक्ति और रक्षक भावना का प्रतीक है। इस चक्र का रंग कांस्य (ब्रॉन्ज़) होता है और इसे गहरे बैंगनी रंग की रिबन के साथ पहनाया जाता है।

 

इस अलंकरण के साथ प्राप्त होने वाला आर्थिक भत्ता भी प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि सम्मानजनक होता है। समय-समय पर इसकी राशि में संशोधन किए गए हैं। वर्तमान में केंद्र और कई राज्य सरकारें इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले व्यक्तियों को मासिक पेंशन, भूमि अनुदान, आवास सुविधाएँ तथा विभिन्न प्रकार की रियायतें प्रदान करती हैं। मरणोपरांत यह लाभ उनके परिजनों को स्थानांतरित किए जाते हैं।

परमवीर चक्र केवल एक पदक नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा प्रतीक बन चुका है जो भारतवर्ष में सर्वोच्च बलिदान और अटूट निष्ठा की पहचान है। इस पुरस्कार की प्रतिष्ठा न केवल सशस्त्र बलों में, बल्कि सामान्य नागरिकों के बीच भी अत्यंत ऊँची मानी जाती है। इसका उल्लेख भारतीय सैन्य इतिहास में अत्यंत गर्व और सम्मान के साथ किया जाता है।

सालों से यह अलंकरण भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। देशभक्ति, साहस और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक के रूप में इस सम्मान का नाम हर भारतीय के हृदय में एक विशेष स्थान रखता है। चाहे कोई युद्धकाल हो या राष्ट्रीय आपातस्थिति, जब भी इस पुरस्कार का नाम लिया जाता है, उसके साथ जुड़ी होती है एक कहानी – राष्ट्रप्रेम की, बलिदान की, और एक अडिग संकल्प की।

परमवीर चक्र का इतिहास भारतीय सैन्य संस्कृति की महानतम परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है और यह आने वाले वर्षों में भी वीरता के उच्चतम मानकों को स्थापित करता रहेगा। यह केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि भारत के सशस्त्र बलों की आत्मा का प्रतीक है, जो आने वाली पीढ़ियों को निस्वार्थ सेवा, साहस और समर्पण के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता रहेगा।

"सैन्य वीरों का समग्र विश्लेषण"

मेजर सोमनाथ शर्मा

मेजर सोमनाथ शर्मा, जो ३१ जनवरी १९२३ को हिमाचल प्रदेश के डेडो गाँव में जन्मे थे, भारतीय सेना की ४ कुमाऊँ रेजीमेंट के वीर सैनिक थे और स्वतंत्र भारत के पहले परमवीर चक्र विजेता बने। ३ नवम्बर १९४७ को जम्मू-कश्मीर के बड़गाम में, उन्होंने लगभग १२० सैनिकों के साथ ५०० से अधिक पाकिस्तानी घुसपैठियों का डटकर मुकाबला किया, ताकि श्रीनगर हवाई अड्डे की रक्षा की जा सके। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने युद्ध में भाग लिया और अद्वितीय साहस का प्रदर्शन करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी शहादत से भारतीय सेना को समय मिला, जिससे कश्मीर को बचाया जा सका। २६ जनवरी १९५० को उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनके अंतिम शब्द—”हम एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे”—आज भी भारतीय सैनिकों को प्रेरणा देते हैं।

लांस नायक करम सिंह

लांस नायक करम सिंह, जिनका जन्म १५ सितम्बर १९१५ को पंजाब के बर्नाला ज़िले के सहरण कलाँ गाँव में हुआ था, भारतीय सेना की सिख रेजीमेंट के वीर सैनिक थे और उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। १३ अक्टूबर १९४८ को जम्मू-कश्मीर के तिथवाल सेक्टर में, उन्होंने पाकिस्तानी सेना के बार-बार किए गए हमलों का डटकर सामना किया। अत्यधिक संख्या में दुश्मनों द्वारा मोर्चे को घेरने के बावजूद, लांस नायक करम सिंह ने अपने साथी सैनिकों का नेतृत्व किया और कई घुसपैठियों को मौत के घाट उतारा। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे अपनी पोस्ट छोड़ने से इंकार करते रहे और अपने साहस व नेतृत्व से दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर किया। उनके अद्वितीय शौर्य के लिए उन्हें २६ जनवरी १९५० को स्वतंत्र भारत के दूसरे परमवीर चक्र विजेता के रूप में मरणोत्तर नहीं, बल्कि जीवित रहते हुए सम्मानित किया गया। उनका यह पराक्रम भारतीय सैनिकों के लिए आज भी प्रेरणा का स्रोत है।

सेकंड लेफ्टिनेंट रमा राघोबा राणे

ChatGPT said:

सेकंड लेफ्टिनेंट रमा राघोबा राणे, जिनका जन्म २६ जून १९१८ को महाराष्ट्र के सांगली ज़िले में हुआ था, भारतीय सेना की ३७वीं असम इंजीनियर रेजीमेंट के वीर अधिकारी थे। उन्हें परमवीर चक्र उस वीरता के लिए प्रदान किया गया जो उन्होंने भारत-पाक युद्ध १९४७–४८ के दौरान दिखाई। ८ अप्रैल १९४८ को जम्मू-कश्मीर के नौशेरा सेक्टर में, जब भारतीय टैंक और सेना को आगे बढ़ने से रोकने के लिए दुश्मन ने सड़क पर अवरोध (रुकावटें) और बारूदी सुरंगें बिछा दी थीं, तब राणे ने अपनी टीम के साथ लगातार गोलाबारी के बीच लगभग २४ घंटों तक काम किया और रास्ता साफ़ किया। उन्होंने न केवल रास्ता खोला, बल्कि कई दुश्मन ठिकानों को नष्ट कर भारतीय सेना की बड़ी टुकड़ी को आगे बढ़ने में सहायता की। उनकी अद्वितीय वीरता, साहस और तकनीकी कौशल के लिए उन्हें २६ जनवरी १९५० को स्वतंत्र भारत का तीसरा परमवीर चक्र प्रदान किया गया। उनका यह योगदान सेना के इंजीनियर कोर के लिए गौरव का प्रतीक है।

नायैक जादूनाथ सिंह

नायक जादूनाथ सिंह, जिनका जन्म २१ नवम्बर १९१६ को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर ज़िले के खजुरी गाँव में हुआ था, भारतीय सेना की १ राजपूत रेजीमेंट के वीर जवान थे। उन्हें परमवीर चक्र मरणोपरांत १९४८ में भारत-पाक युद्ध के दौरान अद्वितीय शौर्य और बलिदान के लिए प्रदान किया गया। ६ फरवरी १९४८ को जम्मू-कश्मीर के नौशेरा सेक्टर में जब पाकिस्तानी हमलावरों ने भारी संख्या में हमला किया, तब जादूनाथ सिंह ने केवल ९ सैनिकों के साथ तीन बार दुश्मन के हमलों को रोका। दो बार घायल होने के बावजूद उन्होंने आख़िरी हमले में अकेले मोर्चा संभाला और कई दुश्मनों को मार गिराया, अंततः वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी बहादुरी से भारतीय सेना को समय मिला और दुश्मन को पीछे हटना पड़ा। २६ जनवरी १९५० को उन्हें मरणोपरांत भारत के चौथे परमवीर चक्र विजेता के रूप में सम्मानित किया गया। उनका बलिदान देश की रक्षा के लिए सर्वोच्च समर्पण का उदाहरण है।

कंपनी हवलदार मेजर पीरु सिंह

कंपनी हवलदार मेजर पीरु सिंह, जिनका जन्म २० मई १९१८ को राजस्थान के झुंझुनू ज़िले के बागोड़ा गाँव में हुआ था, भारतीय सेना की राजपुताना राइफल्स के एक अत्यंत वीर जवान थे। उन्हें परमवीर चक्र १९४८ के भारत-पाक युद्ध में अद्वितीय साहस और बलिदान के लिए मरणोपरांत प्रदान किया गया। १८ जुलाई १९४८ को जम्मू-कश्मीर के तिथवाल सेक्टर में जब भारतीय सेना को एक कठिन पहाड़ी क्षेत्र में कब्जा जमाए पाकिस्तानी दुश्मनों को हटाना था, तब पीरु सिंह ने अपने पूरे प्लाटून के लगभग सभी साथियों के शहीद हो जाने के बावजूद अकेले आगे बढ़ते हुए दुश्मन की कई चौकियाँ तबाह कर दीं। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे दुश्मन की अंतिम बंकर तक पहुँचे और ग्रेनेड फेंकते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनके इस अद्भुत शौर्य, आत्मबलिदान और मिशन के प्रति समर्पण के लिए उन्हें २६ जनवरी १९५० को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनका बलिदान आज भी भारतीय सेना के लिए प्रेरणा का प्रतीक है।

कैप्टन विक्रम बत्रा

कैप्टन विक्रम बत्रा, जिनका जन्म ९ सितम्बर १९७४ को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ था, भारतीय सेना की १३ जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स के एक अद्वितीय साहसी और प्रेरणादायक अधिकारी थे। उन्हें परमवीर चक्र १९९९ के कारगिल युद्ध में दिखाए गए असाधारण शौर्य और बलिदान के लिए मरणोपरांत प्रदान किया गया। जून १९९९ में उन्होंने पॉइंट ५१४० को दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराया, जिसके दौरान उन्होंने “ये दिल माँगे मोर!” का नारा देकर पूरे देश में उत्साह भर दिया। इसके बाद ७ जुलाई १९९९ को उन्होंने पॉइंट ४८७५ पर फिर से हमला किया और एक घायल साथी अधिकारी को बचाते हुए स्वयं आगे बढ़कर कई दुश्मनों को मार गिराया, परन्तु वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी वीरता और नेतृत्व ने भारत को निर्णायक विजय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। १५ अगस्त १९९९ को उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। कैप्टन विक्रम बत्रा का जीवन साहस, बलिदान और देशभक्ति का एक अमर उदाहरण है।

कैप्टन गुरबचना सिंह सलारिया

कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया, जिनका जन्म २९ नवम्बर १९३५ को पंजाब के गुरदासपुर ज़िले के शकरगढ़ (अब पाकिस्तान में) में हुआ था, भारतीय सेना की १ गोरखा राइफल्स (१/११ गोरखा राइफल्स) के वीर अधिकारी थे। उन्हें परमवीर चक्र १९६१ में कांगो (अफ्रीका) में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के दौरान असाधारण साहस और नेतृत्व के लिए मरणोपरांत प्रदान किया गया। ५ दिसम्बर १९६१ को कांगो में जब कातांगाई विद्रोहियों ने संयुक्त राष्ट्र की एक टुकड़ी को घेर लिया, तब कैप्टन सलारिया को उन्हें मुक्त कराने का आदेश मिला। उन्होंने अपनी छोटी टुकड़ी के साथ आगे बढ़ते हुए भारी हथियारों से लैस दुश्मनों पर अचानक हमला किया और गोरखा खुखरी से दर्जनों विद्रोहियों को मार गिराया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया, लेकिन वीरगति को प्राप्त हुए। उनके अद्वितीय शौर्य, नेतृत्व और बलिदान के लिए उन्हें २६ जनवरी १९६२ को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। कैप्टन सलारिया संयुक्त राष्ट्र के किसी मिशन में परमवीर चक्र पाने वाले एकमात्र भारतीय सैनिक हैं और उनका बलिदान भारत की अंतर्राष्ट्रीय वीरता का प्रतीक है।

मेजर धन सिंह थापा

मेजर धन सिंह थापा, जिनका जन्म १० अप्रैल १९२८ को नेपाल के पाल्पा ज़िले में हुआ था, भारतीय सेना की १/८ गोरखा राइफल्स के अत्यंत वीर अधिकारी थे। उन्हें परमवीर चक्र १९६२ के भारत-चीन युद्ध में अद्वितीय साहस, नेतृत्व और बलिदान के लिए प्रदान किया गया। २० अक्टूबर १९६२ को लद्दाख के चुशूल सेक्टर स्थित सिरिजप चौकी पर, जब लगभग ६०० चीनी सैनिकों ने अचानक हमला किया, तब मेजर थापा ने केवल २८ सैनिकों के साथ मोर्चा संभाला। उन्होंने दुश्मन के कई हमलों को रोका और भारी गोलीबारी के बीच अनेक चीनी सैनिकों को मार गिराया। अंततः गोलाबारूद समाप्त होने पर उन्हें बंदी बना लिया गया और युद्धबंदी के रूप में रखा गया, जहाँ उन्होंने दुश्मन की यातनाओं का भी डटकर सामना किया। युद्ध समाप्ति के बाद वे सकुशल भारत लौटे। उनकी वीरता और अडिग नेतृत्व के लिए उन्हें २६ जनवरी १९६३ को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। मेजर धन सिंह थापा का जीवन अदम्य साहस और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक है।

सूबेदार जोगिंदर सिंह

सूबेदार जोगिंदर सिंह, जिनका जन्म २६ सितम्बर १९२१ को पंजाब के मोगा ज़िले के महला कलां गाँव में हुआ था, भारतीय सेना की सिख रेजीमेंट (१ सिख) के एक महान वीर योद्धा थे। उन्हें परमवीर चक्र १९६२ के भारत-चीन युद्ध में अद्वितीय शौर्य, नेतृत्व और बलिदान के लिए मरणोपरांत प्रदान किया गया। २३ अक्टूबर १९६२ को अरुणाचल प्रदेश (तत्कालीन नेफ़ा) के तवांग सेक्टर के टोन्पें ला दर्रे पर, जब लगभग २०० चीनी सैनिकों ने उनकी पोस्ट पर हमला किया, तब सूबेदार जोगिंदर सिंह ने मात्र २० सैनिकों के साथ दुश्मन के तीन लगातार हमलों को रोका। उन्होंने न केवल अपने साथियों का उत्साह बनाए रखा, बल्कि घायल होने के बावजूद बंदूक चलाते रहे और दुश्मनों को भारी नुकसान पहुँचाया। अंततः वे गंभीर रूप से घायल होकर बंदी बना लिए गए और वीरगति को प्राप्त हुए। उनके अतुलनीय साहस और मातृभूमि के प्रति समर्पण के लिए उन्हें २६ जनवरी १९६३ को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनका बलिदान भारतीय सेना के इतिहास में सदा अमर रहेगा।

मेजर शैतान सिंह

मेजर शैतान सिंह, जिनका जन्म १ दिसम्बर १९२४ को राजस्थान के बीकानेर ज़िले के सुरपुर गाँव में हुआ था, भारतीय सेना की १३ कुमाऊँ रेजीमेंट के एक असाधारण वीर अधिकारी थे। १७ नवम्बर १९६२ को लद्दाख के रेचिन ला क्षेत्र में, जब चीन ने भारी संख्या में सैनिकों के साथ हमला किया, तब मेजर शैतान सिंह ने अपनी कंपनी का नेतृत्व करते हुए दुश्मन के तीन बड़े हमलों को नाकाम कर दिया। अत्यधिक ठंड और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने जवानों को प्रोत्साहित किया और स्वयं आगे रहकर लड़ते रहे। गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने पीछे हटने से इंकार कर दिया और अंततः वीरगति को प्राप्त हुए। उनके अतुलनीय साहस, नेतृत्व और मातृभूमि के प्रति समर्पण के लिए उन्हें २६ जनवरी १९६३ को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनका बलिदान भारतीय सैन्य इतिहास में वीरता और कर्तव्यनिष्ठा का अमर प्रतीक है।

लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे

लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे, जिनका जन्म २५ जून १९७५ को उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले के रुन्ना गाँव में हुआ था, भारतीय सेना की १/११ गोरखा राइफल्स के अत्यंत साहसी और प्रेरणादायक अधिकारी थे। उन्हें परमवीर चक्र १९९९ के कारगिल युद्ध में असाधारण वीरता और नेतृत्व के लिए मरणोपरांत प्रदान किया गया। ११ जुलाई १९९९ को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा सेक्टर में स्थित खालूबार की चोटी पर कब्ज़ा करने का जिम्मा जब उनकी टुकड़ी को मिला, तब लेफ्टिनेंट मनोज पांडे ने अपने जवानों का नेतृत्व करते हुए दुर्गम पहाड़ियों में भारी गोलीबारी का सामना करते हुए कई दुश्मन बंकरों को नष्ट किया। इस दौरान उनके सिर, कंधे और पैर में कई गोलियाँ लगीं, लेकिन उन्होंने अंतिम बंकर पर कब्ज़ा करने तक लड़ाई जारी रखी और वीरगति को प्राप्त हुए। उनके अद्वितीय साहस, आत्मबलिदान और मातृभूमि के प्रति समर्पण के लिए उन्हें १५ अगस्त १९९९ को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनका जीवन देशभक्ति और वीरता का एक जीवंत उदाहरण है, जो हर युवा को प्रेरित करता है।

कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद

कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद, जिनका जन्म १ जुलाई १९३३ को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर ज़िले के धामूपुर गाँव में हुआ था, भारतीय सेना की ४ ग्रेनेडियर्स रेजीमेंट के एक अत्यंत साहसी और अद्वितीय योद्धा थे। उन्हें परमवीर चक्र १९६५ के भारत-पाक युद्ध में असाधारण वीरता और बलिदान के लिए मरणोपरांत प्रदान किया गया। १० से ११ सितम्बर १९६५ को पंजाब के खेमकरण सेक्टर में जब पाकिस्तानी सेना के अत्याधुनिक पैटन टैंकों ने भारतीय मोर्चे पर हमला किया, तब अब्दुल हमीद ने अकेले ही अपने रेकोइललेस गन से लगातार तीन दुश्मन टैंकों को नष्ट कर दिया। उन्होंने जान की परवाह किए बिना अगला निशाना साधते हुए चौथा टैंक भी उड़ा दिया, लेकिन उसी दौरान दुश्मन की गोलीबारी में वीरगति को प्राप्त हुए। उनके इस अद्वितीय शौर्य, सूझबूझ और बलिदान के लिए उन्हें २६ जनवरी १९६६ को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। CQMH अब्दुल हमीद का नाम भारतीय सेना के इतिहास में टैंकों के विनाशक और असाधारण वीर योद्धा के रूप में सदा अमर रहेगा।

लेफ्टिनेंट कर्नल आर. तारापोर

लेफ्टिनेंट कर्नल अरुंधति तारापोर (प्रचलित नाम: आर. तारापोर), जिनका जन्म १८ अगस्त १९२३ को महाराष्ट्र के पूना (अब पुणे) में हुआ था, भारतीय सेना की पूना हॉर्स रेजीमेंट (१७ कैवेलरी) के एक साहसी और कुशल टैंक कमांडर थे। उन्हें परमवीर चक्र १९६५ के भारत-पाक युद्ध में अद्वितीय वीरता, नेतृत्व और बलिदान के लिए मरणोपरांत सम्मानित किया गया। ११ से १६ सितम्बर १९६५ के दौरान, सियालकोट सेक्टर (पाकिस्तान) में चाविंडा के पास जब भारतीय सेना ने टैंक युद्ध में पाकिस्तान की पैटन टैंक ब्रिगेड से मुकाबला किया, तब ले. कर्नल तारापोर ने अपने टैंकों के साथ दुश्मन पर भारी हमला बोला और अकेले अपने नेतृत्व में ६० से अधिक पाकिस्तानी टैंकों को नष्ट किया। वे कई बार घायल हुए, फिर भी युद्धभूमि नहीं छोड़ी और अंततः १६ सितम्बर १९६५ को वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी साहसिक योजना और अद्वितीय वीरता ने भारत को निर्णायक बढ़त दिलाई। इसके लिए उन्हें २६ जनवरी १९६६ को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। ले. कर्नल आर. तारापोर का नाम भारतीय टैंक युद्ध इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

लांस नायक अल्बर्ट एक्का

लांस नायक अल्बर्ट एक्का, जिनका जन्म २७ दिसम्बर १९४२ को झारखंड (तत्कालीन बिहार) के गुमला ज़िले के झरी गाँव में हुआ था, भारतीय सेना की १४ गार्ड्स रेजीमेंट के एक अत्यंत साहसी और जांबाज़ सैनिक थे। उन्हें परमवीर चक्र १९७१ के भारत-पाक युद्ध में अद्वितीय शौर्य, दृढ़ता और बलिदान के लिए मरणोपरांत प्रदान किया गया। ३ दिसम्बर १९७१ की रात को बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए चल रही लड़ाई के दौरान, जब भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के गंगासागर क्षेत्र में हमला किया, तब अल्बर्ट एक्का ने दुश्मन की बंकरों से हो रही भारी गोलीबारी के बीच आगे बढ़ते हुए एक-एक कर दो बंकरों को नष्ट किया। इस मिशन के दौरान वे गंभीर रूप से घायल हुए, परंतु अंतिम साँस तक लड़ते रहे और लक्ष्य को सफल बनाया। उनके अदम्य साहस और बलिदान के लिए उन्हें २६ जनवरी १९७२ को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। लांस नायक अल्बर्ट एक्का का बलिदान भारतीय सेना के लिए वीरता और कर्तव्य का एक अमर उदाहरण है।

फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों

फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों, जिनका जन्म १७ जुलाई १९४३ को पंजाब के लुधियाना ज़िले के इस्सेवाल गाँव में हुआ था, भारतीय वायुसेना के एक साहसी और अद्वितीय फाइटर पायलट थे। उन्हें परमवीर चक्र १९७१ के भारत-पाक युद्ध में शौर्य और बलिदान के लिए मरणोपरांत प्रदान किया गया। १४ दिसम्बर १९७१ को श्रीनगर एयरबेस पर तैनात रहते हुए, जब छह पाकिस्तानी एफ-८६ सेबर जेट विमानों ने एयरबेस पर हमला किया, तब फ्लाइंग ऑफिसर सेखों ने अपने Gnat फाइटर विमान से तुरंत प्रतिक्रिया दी। उन्होंने अकेले ही दुश्मन के कई विमानों को चुनौती दी और दो विमानों को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया। भारी असमानता के बावजूद उन्होंने दुश्मन से मोर्चा नहीं छोड़ा, परंतु लड़ाई के दौरान उनका विमान क्षतिग्रस्त हो गया और वे वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें २६ जनवरी १९७२ को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। वे भारतीय वायुसेना के अब तक के एकमात्र परमवीर चक्र विजेता हैं और उनके साहस की गाथा आज भी वायुसेना के हर योद्धा को प्रेरणा देती है।

ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव

ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव, जिनका जन्म १० मई १९८० को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर ज़िले के औरंगाबाद अहीर गाँव में हुआ था, भारतीय सेना की १८ ग्रेनेडियर्स रेजीमेंट के एक अत्यंत साहसी और प्रेरणादायक जवान हैं। उन्हें परमवीर चक्र १९९९ के कारगिल युद्ध में असाधारण वीरता, अदम्य साहस और कर्तव्यनिष्ठा के लिए जीवित रहते हुए यह सम्मान प्रदान किया गया। ४ जुलाई १९९९ को टाइगर हिल पर कब्ज़े के मिशन के दौरान, जब उनकी टीम दुर्गम चढ़ाई के बीच भारी दुश्मन गोलीबारी की चपेट में आई, तब योगेंद्र सिंह यादव ने जान की परवाह किए बिना रस्सी के सहारे चोटी पर चढ़ाई की और दुश्मन के बंकर पर ग्रेनेड फेंक कर उसे ध्वस्त किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने तीन पाकिस्तानी बंकरों को नष्ट किया और अपनी टुकड़ी के लिए रास्ता साफ़ किया। इस अद्वितीय पराक्रम के लिए उन्हें १५ अगस्त १९९९ को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव का साहस भारतीय सेना के हर जवान के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल

सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल, जिनका जन्म १४ अक्टूबर १९५० को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था, भारतीय सेना की प्रतिष्ठित १७ पूना हॉर्स रेजीमेंट के एक अत्यंत साहसी और युवा टैंक कमांडर थे। उन्हें परमवीर चक्र १९७१ के भारत-पाक युद्ध में अद्वितीय वीरता, आत्मबलिदान और नेतृत्व के लिए मरणोपरांत प्रदान किया गया। १६ दिसम्बर १९७१ को जसौर, शकरगढ़ सेक्टर (पंजाब फ्रंट) में जब उनकी टुकड़ी पर भारी पाकिस्तानी टैंकों ने हमला किया, तब मात्र २१ वर्षीय अरुण खेतरपाल ने दुश्मन के लगातार हमलों का सामना करते हुए अपने टैंक से अकेले ही १० से अधिक दुश्मन टैंकों को नष्ट कर दिया। गंभीर रूप से घायल होने और टैंक क्षतिग्रस्त होने के बावजूद उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा और अंततः वीरगति को प्राप्त हुए। उनके इस अद्वितीय शौर्य और मातृभूमि के प्रति समर्पण के लिए उन्हें २६ जनवरी १९७२ को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल का बलिदान भारतीय सेना के इतिहास में अविस्मरणीय साहस और प्रेरणा का प्रतीक है।

मेजर होशियार सिंह दहिया

मेजर होशियार सिंह दहिया, जिनका जन्म ५ मई १९३७ को हरियाणा के सोनीपत ज़िले के सिसाना गाँव में हुआ था, भारतीय सेना की ३ ग्रेनेडियर्स रेजीमेंट के एक अत्यंत साहसी और प्रेरणास्पद अधिकारी थे। उन्हें १९७१ के भारत-पाक युद्ध में अद्वितीय शौर्य, नेतृत्व और कर्तव्यनिष्ठा के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। १५ से १७ दिसम्बर १९७१ के बीच शकरगढ़ सेक्टर के बसंतर नदी क्षेत्र में जब भारतीय सेना को दुश्मन के कब्ज़े वाले क्षेत्र में पोस्ट स्थापित करनी थी, तब मेजर होशियार सिंह ने अपनी कंपनी का नेतृत्व करते हुए भारी गोलीबारी के बीच कई दुश्मन बंकरों पर कब्ज़ा किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे लगातार मोर्चे पर डटे रहे और अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाते रहे। उनके साहस और दृढ़ संकल्प ने दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया और भारत को निर्णायक जीत दिलाई। उनके इस अद्वितीय शौर्य के लिए उन्हें २६ जनवरी १९७२ को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। मेजर होशियार सिंह दहिया का जीवन साहस, नेतृत्व और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक है।

नायब सूबेदार बाना सिंह

नायब सूबेदार बाना सिंह, जिनका जन्म ६ जनवरी १९४९ को जम्मू-कश्मीर के कार्ना गाँव (जिला जम्मू) में हुआ था, भारतीय सेना की ८ जम्मू एंड कश्मीर लाइट इन्फैंट्री के एक अत्यंत साहसी और प्रेरणास्पद वीर सैनिक हैं। उन्हें १९८७ में सियाचिन ग्लेशियर के एक अत्यंत कठिन अभियान में अद्वितीय शौर्य और पराक्रम के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उस समय पाकिस्तानी सैनिकों ने सियाचिन में एक दुर्गम ऊँचाई पर कब्ज़ा कर रखा था, जिसे वे अजेय मानते थे और “क्वायद पोस्ट” कहते थे। २३ जून १९८७ को बाना सिंह ने एक विशेष गश्ती दल का नेतृत्व करते हुए भीषण ठंड, बर्फ़ीले तूफ़ान और दुश्मन की गोलीबारी के बीच खड़ी चट्टानों पर चढ़ाई की और सीधे दुश्मन की बंकर पर हमला कर कई पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया तथा पोस्ट पर कब्ज़ा कर लिया। उनके इस अद्वितीय पराक्रम के सम्मान में उस पोस्ट का नाम बदलकर “बाना टॉप” रख दिया गया। उन्हें यह सम्मान २६ जनवरी १९८८ को प्रदान किया गया। नायब सूबेदार बाना सिंह का साहस, देशभक्ति और विजय का जज़्बा आज भी भारतीय सेना के लिए प्रेरणा का स्तंभ है।

मेजर रामास्वामी परमेश्वरन

मेजर रामास्वामी परमेश्वरन, जिनका जन्म १३ जुलाई १९४६ को मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था, भारतीय सेना की ८ महार रेजीमेंट के एक अत्यंत साहसी, निडर और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी थे। उन्हें परमवीर चक्र १९८७ में श्रीलंका में भारतीय शांति सेना (IPKF) के अभियान के दौरान अद्वितीय शौर्य और बलिदान के लिए मरणोपरांत प्रदान किया गया। २५ नवम्बर १९८७ को जब उनकी टुकड़ी श्रीलंका के जाफ़ना क्षेत्र में गश्त पर थी, तब उन पर अचानक घात लगाकर हमला किया गया। मेजर परमेश्वरन ने तुरंत मोर्चा संभालते हुए अपनी टुकड़ी को पुनर्गठित किया और एक साहसी पीछे से हमला करके दुश्मनों को चौंका दिया। गोली लगने के बावजूद उन्होंने दुश्मन के एक आतंकवादी से हथियार छीना और लड़ते हुए अपने सैनिकों का नेतृत्व करते रहे। अंततः वे वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन उनकी वीरता से दुश्मन को भारी नुकसान पहुँचा और भारतीय टुकड़ी सुरक्षित रही। उनके अद्वितीय साहस और नेतृत्व के लिए उन्हें २६ जनवरी १९८८ को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। मेजर रामास्वामी परमेश्वरन का बलिदान राष्ट्रसेवा, साहस और प्रेरणा की अमिट मिसाल है।

राइफलमैन संजय कुमार

राइफलमैन संजय कुमार, जिनका जन्म ३ मार्च १९७६ को हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर ज़िले के कालोल गाँव में हुआ था, भारतीय सेना की १३ जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स के एक अत्यंत साहसी और दृढ़ निश्चयी वीर सैनिक हैं। उन्हें परमवीर चक्र वर्ष १९९९ के कारगिल युद्ध में असाधारण वीरता, साहस और अदम्य आत्मबलिदान के लिए जीवित रहते हुए प्रदान किया गया। ४ जुलाई १९९९ को टाइगर हिल के नज़दीक एक अत्यंत दुर्गम पोस्ट पर हमला करते समय, जब उनकी टुकड़ी दुश्मन की भारी गोलीबारी में फँस गई, तब राइफलमैन संजय कुमार ने अकेले आगे बढ़कर दुश्मन की गोलियों का सामना किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने एक बंकर पर कब्ज़ा किया और वहाँ से दुश्मन पर गोलियाँ बरसाते हुए दो अन्य बंकरों को भी कब्ज़े में ले लिया। उनकी इस अद्वितीय बहादुरी ने मिशन की सफलता सुनिश्चित की। उनके वीरता पूर्ण कार्य के लिए उन्हें १५ अगस्त १९९९ को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। राइफलमैन संजय कुमार का साहस और राष्ट्रभक्ति आज भी हर सैनिक के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

जो राष्ट्र की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति देते हैं, उनका सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि इतिहास की अमिट स्मृति से होता है; परमवीर चक्र प्राप्तकर्ता वे अद्वितीय योद्धा हैं जिन्होंने कर्तव्य, साहस और त्याग की पराकाष्ठा का उदाहरण स्थापित किया है—ये वो वीर हैं जिनका पराक्रम युगों तक प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।