श्री हुकम सिंह पांगती
हुकम सिंह पांगती – भारतीय पर्वतारोहण के अग्रदूत
श्री हुकम सिंह पांगती भारत के एक प्रतिष्ठित पर्वतारोही और हिमालयी अभियानों के विशेषज्ञ रहे हैं, जिनका जन्म उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद के मुनस्यारी क्षेत्र में हुआ। उन्होंने भारतीय पर्वतारोहण के क्षेत्र में जो योगदान दिया, वह अत्यंत सराहनीय और प्रेरणादायक है। पर्वतीय अभियानों में उनकी गहन समझ, मार्गदर्शन क्षमता और संगठनात्मक कौशल के लिए वे व्यापक रूप से सम्मानित रहे हैं। उन्होंने कई उच्च हिमालयी अभियानों का सफल नेतृत्व किया तथा दुर्गम और अज्ञात पर्वतीय क्षेत्रों में अभियान संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
श्री पांगती न केवल एक कुशल पर्वतारोही थे, बल्कि एक अद्भुत योजनाकार और मार्गदर्शक भी थे, जिनकी रणनीति और दिशा-निर्देशन के कारण कई कठिन अभियानों को सफलता मिली। उनके अनुभव ने पर्वतारोहण क्षेत्र में भारत की स्थिति को मज़बूत किया और अनेक युवाओं को इस क्षेत्र से जोड़ने में मदद की। उनके विशिष्ट योगदान को भारत सरकार ने मान्यता देते हुए वर्ष 1992 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया, जो देश का एक प्रमुख नागरिक सम्मान है। यह सम्मान उनके उत्कृष्ट सेवाभाव, परिश्रम और पर्वतारोहण में दीर्घकालिक योगदान का प्रतीक है।
श्री पांगती का जीवन पर्वतीय क्षेत्र की कठिनाइयों में तपे हुए व्यक्तित्व का उदाहरण है, जिन्होंने न केवल स्वयं शिखर छुए, बल्कि दूसरों को भी मार्ग दिखाया। उन्होंने पर्वतीय संस्कृति, जीवनशैली और भूगोल की भी गहरी समझ विकसित की, जिससे पर्वतारोहण अभियानों के साथ-साथ हिमालयी क्षेत्रों के संरक्षण और स्थानीय सहभागिता को भी बल मिला। मुनस्यारी जैसे सीमांत और दुर्गम क्षेत्र से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना उनके असाधारण संकल्प, नेतृत्व क्षमता और कठोर परिश्रम का परिणाम है।
वे न केवल एक पर्वतारोही बल्कि हिमालय की आत्मा से गहराई से जुड़े हुए व्यक्ति थे, जिनकी सोच और कर्म दोनों ने भारतीय पर्वतारोहण को नई दिशा दी। उनका कार्य जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए न केवल प्रेरणा का स्रोत है, बल्कि यह भी प्रमाण है कि सीमित संसाधनों और विषम परिस्थितियों में भी उत्कृष्टता प्राप्त की जा सकती है। श्री हुकम सिंह पांगती भारतीय पर्वतारोहण इतिहास के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, जिनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
श्री हुकम सिंह पांगती को उनके अद्वितीय साहस, पर्वतारोहण में असाधारण योगदान और हिमालयी अभियानों में उनके नेतृत्व के लिए श्रद्धापूर्वक नमन। दुर्गम पहाड़ों की ऊँचाइयों को स्पर्श करते हुए उन्होंने न केवल भारत की गौरवशाली पर्वतारोहण परंपरा को समृद्ध किया, बल्कि नई पीढ़ियों के लिए भी एक प्रेरणास्रोत की भूमिका निभाई। सीमांत क्षेत्र मुनस्यारी की मिट्टी से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना उनके अदम्य संकल्प, अनुशासन और कर्मठता का प्रतीक है। उन्होंने पर्वतीय संस्कृति, प्रकृति संरक्षण और जनभागीदारी को भी अपने अभियानों से जोड़ा, जिससे उनका योगदान केवल खेल तक सीमित न रहकर व्यापक सामाजिक महत्व का बन गया। उनका जीवन और कार्य भारतीय साहसिक परंपरा के गौरवशाली अध्याय हैं, जिन्हें सदैव श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण किया जाएगा।
