वीरता के प्रतीक: सैन्य पुरस्कार
भारत सरकार द्वारा वीरता, साहस और बलिदान के लिए दिए जाने वाले पुरस्कारों को सामूहिक रूप से “वीरता पुरस्कार” कहा जाता है। ये पुरस्कार उन व्यक्तियों को सम्मानित करने हेतु प्रदान किए जाते हैं जिन्होंने राष्ट्र की सुरक्षा, संप्रभुता और नागरिकों की रक्षा हेतु अपनी जान की परवाह किए बिना असाधारण साहस और वीरता का प्रदर्शन किया हो। ये पुरस्कार केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शांति के समय भी संकट की घड़ी में अद्वितीय पराक्रम दिखाने वालों को समान रूप से सम्मानित करते हैं।
🔥 युद्धकालीन वीरता पुरस्कार
🥇परम वीर चक्र
परम वीर चक्र भारत का सर्वोच्च सैन्य वीरता पुरस्कार है, जो युद्ध के समय शत्रु के विरुद्ध अद्वितीय साहस और वीरता का प्रदर्शन करने वाले सैनिकों को प्रदान किया जाता है। यह सम्मान उन योद्धाओं को दिया जाता है जिन्होंने अत्यंत कठिन और खतरनाक परिस्थितियों में अपने प्राणों की परवाह किए बिना देश की रक्षा में असाधारण शौर्य का परिचय दिया हो। यह पदक भारतीय सशस्त्र बलों के उन वीर सैनिकों की सर्वोच्च पहचान है जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा में परम बलिदान दिया हो।
इस पुरस्कार की स्थापना 26 जनवरी 1950 को हुई थी, और इसे 15 अगस्त 1947 से लागू माना गया। यह स्वतंत्र भारत का सर्वोच्च सैन्य अलंकरण है। इसे युद्ध क्षेत्र में अप्रतिम पराक्रम, नेतृत्व और आत्मबलिदान के लिए प्रदान किया जाता है। अधिकतर यह पुरस्कार मरणोपरांत दिया गया है, क्योंकि इसे प्राप्त करने वाले अधिकांश सैनिक अपने प्राणों का उत्सर्ग कर चुके होते हैं। यह पदक न केवल एक व्यक्ति की बहादुरी को दर्शाता है, बल्कि यह पूरे राष्ट्र के लिए गौरव और प्रेरणा का स्रोत बनता है।
परम वीर चक्र एक गोलाकार कांस्य पदक होता है, जिसका व्यास लगभग 1.375 इंच होता है। इसके एक ओर चारों कोनों में अशोक की मोहर से लिए गए चार इंद्रध्वज अंकित होते हैं और बीच में एक राजकीय सिंह प्रतीक होता है। दूसरी ओर देवनागरी लिपि में “परम वीर चक्र” उत्कीर्ण होता है। यह पदक गहरे बैंगनी रंग के रिबन से जुड़ा होता है, जिसके बीच में एक पतली नारंगी पट्टी होती है, जो बलिदान और वीरता की प्रतीक मानी जाती है।
यह पुरस्कार राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है और यह थलसेना, वायुसेना तथा नौसेना के किसी भी रैंक के सैनिक को दिया जा सकता है। परम वीर चक्र केवल एक सैन्य सम्मान नहीं, बल्कि यह उन असाधारण योद्धाओं की गाथा है जिन्होंने भारत माता के लिए सर्वस्व अर्पित किया। यह सम्मान आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देता है और यह प्रमाण है कि वीरता अमर होती है।
🥈महावीर चक्र
महावीर चक्र भारत का दूसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है, जो भारतीय सशस्त्र बलों के उन बहादुर सैनिकों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने युद्धभूमि में शत्रु के विरुद्ध असाधारण साहस, पराक्रम और वीरता का प्रदर्शन किया हो। यह सम्मान उन योद्धाओं को दिया जाता है जिन्होंने राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अत्यंत जोखिम उठाकर अपने कर्तव्यों का पालन किया और शत्रु से सीधी मुठभेड़ के दौरान वीरता की मिसाल कायम की।
महावीर चक्र की स्थापना २६ जनवरी १९५० को भारत के गणराज्य बनने के साथ की गई थी। यह पुरस्कार युद्ध, सीमावर्ती संघर्ष, सैन्य अभियानों अथवा किसी सशस्त्र संघर्ष की स्थिति में किए गए अद्वितीय सैन्य कार्यों के लिए प्रदान किया जाता है। यह उन सैनिकों को दिया जाता है जिन्होंने न केवल साहस का परिचय दिया हो, बल्कि सैन्य रणनीति, नेतृत्व और समर्पण की भावना से लड़ते हुए शत्रु की योजनाओं को विफल किया हो। यह पुरस्कार मरणोपरांत भी दिया जा सकता है और अनेक वीरों को यह सम्मान उनके बलिदान के बाद प्राप्त हुआ है।
महावीर चक्र एक गोलाकार रजत (चांदी) का पदक होता है, जिसके एक ओर पांच कोणों वाला उभरा हुआ सितारा होता है और बीच में भारत का राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ अंकित होता है। इसके चारों ओर “महावीर चक्र” शब्द देवनागरी लिपि में उत्कीर्ण होते हैं। यह पदक गहरे लाल रंग के रिबन से जुड़ा होता है, जिसके बीच में सफेद रंग की एक मोटी पट्टी होती है — जो वीरता और बलिदान के प्रतीक माने जाते हैं।
यह पुरस्कार भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना के सभी रैंकों के सैनिकों को दिया जा सकता है। इसे भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है, प्रायः गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसरों पर। यह पुरस्कार न केवल व्यक्तिगत वीरता का प्रतीक है, बल्कि यह भारत की सैन्य परंपरा, गौरव और राष्ट्रसेवा के सर्वोच्च मूल्यों को दर्शाता है। महावीर चक्र उन सच्चे योद्धाओं की अमर गाथा का प्रतीक है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस और प्रेरणा की मिसाल कायम की है।
🏷️ न0-26301 सिपाही शहीद दिवान सिंह दानू 4 कुमाँऊ, पुरदोम-तेजम-1947
🥉 वीर चक्र
वीर चक्र भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जाने वाला तीसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है, जिसे भारतीय सशस्त्र बलों के उन सैनिकों को दिया जाता है जिन्होंने युद्धभूमि में अद्वितीय साहस, पराक्रम और वीरता का प्रदर्शन किया हो। यह पुरस्कार उन वीरों को सम्मानित करने के लिए प्रदान किया जाता है जिन्होंने युद्ध या सैन्य संघर्ष के दौरान शत्रु के सामने अत्यंत साहसिक कार्य किए हों और अपने जीवन की परवाह किए बिना राष्ट्र की रक्षा में अद्वितीय योगदान दिया हो।
इस पुरस्कार की स्थापना २६ जनवरी १९५० को भारत के गणतंत्र बनने के साथ की गई थी। वीर चक्र उन सैनिकों को दिया जाता है जिन्होंने सीमाओं पर या सैन्य अभियानों के दौरान शत्रु सेना के विरुद्ध वीरता के साथ संघर्ष किया हो। यह वीरता व्यक्तिगत रूप से अथवा सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए दिखाई जा सकती है। यह पुरस्कार मरणोपरांत भी प्रदान किया जा सकता है, और कई सैनिकों को यह सम्मान उनके बलिदान के बाद प्रदान किया गया है।
वीर चक्र एक गोलाकार कांस्य पदक होता है, जिसके एक ओर पांच कोनों वाला उभरा हुआ सितारा होता है और बीच में अशोक की लायन कैपिटल का प्रतीक अंकित होता है। दूसरी ओर “वीर चक्र” शब्द देवनागरी लिपि में उत्कीर्ण होते हैं। यह मेडल नारंगी और नीले रंग की पट्टियों वाले रिबन से जुड़ा होता है, जो साहस और बलिदान का प्रतीक माने जाते हैं।
यह सम्मान राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय पर्वों पर प्रदान किया जाता है और यह भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना के सभी रैंकों के सैनिकों को दिया जा सकता है। वीर चक्र प्राप्त करना न केवल व्यक्तिगत सम्मान की बात होती है, बल्कि यह पूरे सैन्य बल और राष्ट्र के लिए गर्व का विषय होता है। यह पुरस्कार उन वीरों की पहचान है जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने कर्तव्य को सर्वोपरि मानते हुए असाधारण साहस का परिचय दिया और देश की अखंडता तथा गौरव को बनाए रखने के लिए अमिट योगदान दिया। वीर चक्र राष्ट्र की ओर से उन रक्षक योद्धाओं को सच्ची श्रद्धांजलि है, जिनका बलिदान और वीरता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहती है।
🕊️ शांतिकालीन वीरता पुरस्कार
🥇अशोक चक्र
अशोक चक्र भारत का सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है, जो असाधारण साहस, वीरता और आत्मबलिदान के लिए प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार उन व्यक्तियों को दिया जाता है जिन्होंने शांति काल में, चाहे वह नागरिक हों या सशस्त्र बल के सदस्य, अपने कर्तव्य के दौरान अत्यंत खतरनाक परिस्थितियों में असाधारण बहादुरी का प्रदर्शन किया हो। यह वीरता युद्धभूमि से इतर होती है, लेकिन उसका स्तर युद्धकालीन परिस्थितियों जैसी गंभीर और चुनौतीपूर्ण होता है।
अशोक चक्र की स्थापना भारत सरकार द्वारा ४ जनवरी १९५२ को की गई थी। प्रारंभ में इसे “अशोक चक्र, श्रेणी–I” के नाम से जाना जाता था, जिसे १९६७ में पुनः नामांकित कर केवल “अशोक चक्र” कर दिया गया। यह पुरस्कार देश के उन सपूतों को दिया जाता है जिन्होंने आतंकवाद विरोधी अभियानों, बंधकों की रक्षा, आपदाओं में बचाव कार्य, अग्निशमन या किसी अन्य जानलेवा स्थिति में निडरता और पराक्रम का परिचय दिया हो। यह पुरस्कार कई बार मरणोपरांत भी प्रदान किया जाता है।
यह पदक कांस्य धातु का बना गोलाकार होता है, जिसके एक ओर अशोक चक्र का प्रतीक (२४ तीलियों वाला चक्र) उकेरा गया होता है। दूसरी ओर इसके चारों ओर देवनागरी लिपि में “अशोक चक्र” शब्द अंकित होते हैं। यह मेडल गहरे हरे रंग के रिबन से जुड़ा होता है, जिसमें बीच में एक नारंगी पट्टी होती है। यह रंग संयोजन साहस, बलिदान और राष्ट्रसेवा का प्रतीक माना जाता है।
अशोक चक्र प्राप्त करना किसी भी भारतीय के लिए सबसे बड़ा नागरिक वीरता सम्मान होता है। यह न केवल व्यक्तिगत शौर्य का प्रतीक है, बल्कि यह उस उच्चतम नैतिक साहस और निष्ठा को भी दर्शाता है जो राष्ट्र सेवा के लिए आवश्यक होती है। यह मेडल उन व्यक्तियों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और सम्मान दिलाता है जिन्होंने अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए अपने जीवन को संकट में डालकर दूसरों की रक्षा की और मानवीय मूल्यों को सर्वोच्च रखा। अशोक चक्र देश के उन सच्चे नायकों को समर्पित है, जिन्होंने अपने अद्वितीय साहस से पूरे भारत को गौरवान्वित किया है।
🏷️न0-4138793 सिपाही राम सिंह, के०आर०सी०, तडाग, मल्लागाँव-1948
🏷️आई0सी0-17696 कैप्टन उम्मेद सिंह, जनकाण्डे खेतीखान-1971
🏷️न0-13621503 हव0 शहीद बहादुर सिंह बोहरा, 10 पैरा रावलखेत-2009
🥈 कीर्ति चक्र
कीर्ति चक्र भारत का दूसरा सबसे बड़ा शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है, जो असाधारण साहस और अदम्य शौर्य के लिए प्रदान किया जाता है। यह सम्मान उन नागरिकों, सैन्यकर्मियों और अर्धसैनिक बलों के सदस्यों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने देश की सेवा में संकटपूर्ण परिस्थितियों में अपने प्राणों की परवाह किए बिना साहस और वीरता का परिचय दिया हो। यह पुरस्कार युद्ध क्षेत्र से इतर, यानी शांति काल में किए गए वीर कृत्यों के लिए प्रदान किया जाता है।
इस पुरस्कार की स्थापना भारत सरकार द्वारा ४ जनवरी १९५२ को की गई थी। आरंभ में इसे “अशोक चक्र द्वितीय श्रेणी” के नाम से जाना जाता था, जिसे १९६७ में बदलकर “कीर्ति चक्र” कर दिया गया। यह उन व्यक्तियों को दिया जाता है जिन्होंने आतंकवाद विरोधी अभियानों, बंधक बचाव, अग्निशमन, आपदा प्रबंधन अथवा अन्य संकट की स्थितियों में बहादुरी से कार्य किया हो। यह पुरस्कार ऐसे नायकों की पहचान है जो अपने अदम्य साहस से न केवल जानें बचाते हैं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र को प्रेरणा प्रदान करते हैं।
कीर्ति चक्र एक कांस्य से निर्मित गोलाकार पदक होता है। इसकी एक ओर भारत का राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ अंकित होता है और दूसरी ओर देवनागरी में “कीर्ति चक्र” शब्द लिखे होते हैं। यह मेडल हरे रंग के रिबन से जुड़ा होता है, जिसमें बीच में एक सफेद रंग की चौड़ी पट्टी होती है। यह रंग संयोजन शांति और साहस का प्रतीक माना जाता है। यह पुरस्कार राष्ट्रपति द्वारा गणतंत्र दिवस या विशेष राष्ट्रीय अवसरों पर प्रदान किया जाता है। यह मरणोपरांत भी दिया जा सकता है।
कीर्ति चक्र प्राप्त करना किसी भी भारतीय नागरिक या सैन्यकर्मी के लिए अत्यंत गर्व और गौरव की बात होती है। यह सम्मान न केवल व्यक्तिगत बहादुरी की पहचान है, बल्कि यह बताता है कि राष्ट्र सेवा केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं होती, बल्कि हर उस स्थान पर होती है जहाँ संकट के समय कोई वीर अपने कर्तव्य का पालन करते हुए दूसरों की रक्षा करता है। कीर्ति चक्र उन सच्चे नायकों को समर्पित है जिन्होंने साहस, आत्मबलिदान और देशप्रेम की मिसाल प्रस्तुत की है।
🏷️ जे० सी०-190062 ऑ० लेप्टी० कल्याण सिंह, 19 आसाम राईफल्स् देवलथल-1975
🏷️ न0-4169805 ला० नायक रमेश सिंह. तगाड़-पिथौ०-1983
🏷️ न0-152779 रा० मैन शहीद गोपाल चन्द्र 15 आसाम राईफल्स, सटगल-छेड़ा-1986
🏷️ न0-4132803 सिपाही हरक सिंह, कुमाँऊ रेजि०, बहिलकोट, बिरगोली-1988
🏷️ न0-172782 ना० सुबे० चन्द्र सिंह, आसाम राइफल्स गोठी बालबगढ़-1988
🏷️ न0-4176880 ना० शहीद गोपाल सिंह पोखरिया कुमाँऊ बिण-1997
🥉शौर्य चक्र
शौर्य चक्र भारत का तीसरा सबसे बड़ा शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है, जो असाधारण साहस, शौर्य और वीरता के प्रदर्शन के लिए नागरिकों और सैन्य कर्मियों को प्रदान किया जाता है। यह सम्मान उन लोगों को दिया जाता है जिन्होंने न केवल अपने कर्तव्यों के दौरान, बल्कि आम जीवन की जटिल परिस्थितियों में भी अपने प्राणों की परवाह किए बिना असाधारण साहस का परिचय दिया हो। यह वीरता युद्ध क्षेत्र से इतर दिखाई गई होती है, जैसे आतंकवाद विरोधी अभियान, बचाव कार्य, संकट की स्थिति में जान जोखिम में डालकर दूसरों की रक्षा करना आदि।
शौर्य चक्र की स्थापना भारत सरकार द्वारा ४ जनवरी १९५२ को की गई थी। प्रारंभ में इसे “अशोक चक्र, तीसरी श्रेणी” के नाम से जाना जाता था, जिसे १९६७ में बदलकर “शौर्य चक्र” कर दिया गया। यह पुरस्कार सैन्यकर्मियों, अर्धसैनिक बलों, पुलिस अधिकारियों और आम नागरिकों को भी प्रदान किया जा सकता है। यह उन वीर व्यक्तियों की पहचान है जो अपनी बहादुरी से समाज और देश को प्रेरणा देते हैं, चाहे वह युद्ध हो या शांति का समय।
शौर्य चक्र एक गोलाकार कांस्य पदक होता है, जिसके एक ओर अशोक चक्र की आकृति और चारों ओर “शौर्य चक्र” शब्द देवनागरी और अंग्रेज़ी में अंकित होते हैं। यह मेडल हरे रंग के रिबन से जुड़ा होता है, जिसमें बीच में एक नारंगी रंग की पट्टी होती है। यह रंग संयोजन साहस, शांति और बलिदान का प्रतीक माना जाता है। यह पुरस्कार राष्ट्रपति द्वारा गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसरों पर प्रदान किया जाता है।
शौर्य चक्र प्राप्त करना किसी भी व्यक्ति के जीवन की एक महान उपलब्धि मानी जाती है। यह न केवल वीरता का प्रतीक है, बल्कि यह बताता है कि एक सच्चा नागरिक या सैनिक अपने देश और समाज के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। यह सम्मान उन गुमनाम नायकों की कहानियों को सामने लाने का कार्य करता है, जिन्होंने अपने कर्तव्य के मार्ग पर चलते हुए असाधारण साहस और समर्पण का परिचय दिया है। शौर्य चक्र भारत के उन जांबाजों को सच्ची श्रद्धांजलि है जिन्होंने अपने साहस से पूरे राष्ट्र का सिर गर्व से ऊँचा किया है।
🏷️ ऊर्बा दत्त
🏷️ चंद्र सिंह कार्की
🛡️ विशिष्ट सेवा और सेना पदक
🔰युद्धकाल में विशिष्ट सेवा
🥇युद्ध सेवा मेडल
सेना मेडल भारत सरकार द्वारा भारतीय थल सेना के अधिकारियों, जूनियर कमीशंड अधिकारियों और सैनिकों को उनकी वीरता, साहस या विशिष्ट सेवा के लिए प्रदान किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण सैन्य सम्मान है। यह पुरस्कार उन लोगों को दिया जाता है जिन्होंने युद्धकाल या शांतिकाल के दौरान असाधारण साहस, निर्भीकता या अनुकरणीय सेवा का प्रदर्शन किया हो। यह सम्मान न केवल युद्धभूमि में दिखाई गई बहादुरी के लिए दिया जाता है, बल्कि ऐसी स्थितियों में भी जब सैनिकों ने जान की परवाह किए बिना किसी मिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया हो।
सेना मेडल की स्थापना भारत सरकार द्वारा १७ जून १९६० को की गई थी। यह पुरस्कार भारतीय सेना के उन सदस्यों को भी प्रदान किया जाता है जिन्होंने आपदा प्रबंधन, आतंकवाद विरोधी अभियानों या अन्य जोखिमपूर्ण स्थितियों में उत्कृष्ट नेतृत्व, तत्परता और समर्पण का परिचय दिया हो। युद्धकाल में यह पुरस्कार वीरता के लिए तथा शांतिकाल में विशिष्ट सेवाओं के लिए प्रदान किया जाता है।
सेना मेडल एक गोलाकार धातु का पदक होता है, जो सामान्यतः चांदी के रंग का होता है। इस पर एक ओर भारत का राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ अंकित होता है, और दूसरी ओर देवनागरी में “सेना मेडल” लिखा होता है। यह मेडल एक गहरे लाल और हरे रंग के रिबन से बंधा होता है जो साहस और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इस पदक को गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसरों पर राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है।
इस सम्मान को पाने वाले सैनिकों के लिए यह मेडल न केवल उनके साहस और सेवाभाव की पहचान होता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनता है। यह पुरस्कार भारतीय सेना के उस गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है जिसमें निष्ठा, कर्तव्य और राष्ट्रसेवा को सर्वोच्च माना गया है। सेना मेडल एक ऐसा गौरव है जिसे प्राप्त करना प्रत्येक सैनिक के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जाता है।
🔰 उच्च स्तर की सेवा
🥈अति विशिष्ट सेवा मेडल
अति विशिष्ट सेवा मेडल भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जाने वाला एक उच्च सैन्य सम्मान है, जो भारतीय सशस्त्र बलों के अधिकारियों को उनकी सेवा के क्षेत्र में दीर्घकालीन, उत्कृष्ट और असाधारण योगदान के लिए प्रदान किया जाता है। यह मेडल शांतिकाल में विशिष्ट सेवाओं के लिए दिया जाता है और इसे भारतीय सेना, नौसेना तथा वायु सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार उन व्यक्तियों को सम्मानित करता है जिनकी नेतृत्व क्षमता, रणनीतिक दृष्टिकोण, प्रशासनिक कौशल और अनुकरणीय कर्तव्यनिष्ठा ने सैन्य प्रणाली और संचालन को उत्कृष्टता की ऊँचाइयों तक पहुँचाया हो।
अति विशिष्ट सेवा मेडल की स्थापना भारत सरकार द्वारा १९६० में की गई थी। यह मेडल उन अधिकारियों को प्रदान किया जाता है जिनका योगदान न केवल उनके विभाग या इकाई के लिए उपयोगी होता है, बल्कि जिनका कार्य पूरे बल की कार्यक्षमता, रणनीति और संरचना में स्थायी प्रभाव छोड़ता है। यह सम्मान वरिष्ठ रैंक के अधिकारियों जैसे लेफ्टिनेंट जनरल, एयर मार्शल या वाइस एडमिरल स्तर के अधिकारियों को अधिकतर दिया जाता है, लेकिन यह किसी भी रैंक के अधिकारी को दिया जा सकता है यदि उसने असाधारण सेवा का प्रदर्शन किया हो।
यह मेडल एक सुंदर गोलाकार पदक होता है जो चांदी के रंग का होता है। इस पर एक ओर भारत का राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ अंकित होता है, और दूसरी ओर देवनागरी में “अति विशिष्ट सेवा मेडल” लिखा होता है। यह मेडल गहरे नीले रंग के रिबन से बंधा होता है जिसमें बीच में एक हल्की पीली पट्टी होती है। यह रंग संयोजन गरिमा, समर्पण और सेवा के प्रतीक के रूप में माना जाता है। यह पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रपति द्वारा गणतंत्र दिवस या विशेष सैन्य समारोहों में प्रदान किया जाता है।
अति विशिष्ट सेवा मेडल प्राप्त करना किसी भी सैन्य अधिकारी के लिए अत्यंत गौरव और सम्मान की बात होती है। यह सम्मान दर्शाता है कि संबंधित अधिकारी ने केवल अपने कर्तव्य का पालन ही नहीं किया, बल्कि उसने सेवा के हर स्तर पर श्रेष्ठता और ईमानदारी की मिसाल पेश की है। यह मेडल न केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों की पहचान है, बल्कि यह समर्पण, नेतृत्व और प्रेरणा का प्रतीक भी है जो सम्पूर्ण सशस्त्र बल को नई दिशा और दृष्टि प्रदान करता है।
🔰 उल्लेखनीय सेवा
🥉विशिष्ट सेवा मेडल
विशिष्ट सेवा मेडल भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जाने वाला एक प्रतिष्ठित सैन्य सम्मान है, जो सशस्त्र सेनाओं के अधिकारियों को उनकी दीर्घकालीन, उत्कृष्ट, उच्चस्तरीय और समर्पित सेवाओं के लिए प्रदान किया जाता है। यह मेडल शांति काल में प्रदान किए जाने वाले उन सम्मानों में से एक है जो किसी भी प्रकार की युद्ध भूमिका के बिना भी सेना में अनुकरणीय सेवाएं देने के लिए दिया जाता है।
यह पुरस्कार भारतीय थल सेना, वायु सेना और नौसेना — तीनों अंगों के स्थायी अधिकारियों को प्रदान किया जाता है। यह मेडल विशेष रूप से उन अधिकारियों को दिया जाता है, जिन्होंने प्रशासन, प्रशिक्षण, योजना निर्माण या किसी तकनीकी अथवा रणनीतिक जिम्मेदारी में असाधारण दक्षता और नेतृत्व का प्रदर्शन किया हो। इसका उद्देश्य उन अधिकारियों को सम्मानित करना होता है, जिन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन अत्यंत ईमानदारी, प्रतिबद्धता और राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव से किया हो।
यह सम्मान पहली बार सन् 1960 में स्थापित किया गया था। इसे राष्ट्रपति द्वारा वर्ष में एक बार, आमतौर पर गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रदान किया जाता है। इस मेडल के साथ कोई नकद पुरस्कार नहीं दिया जाता, लेकिन यह सैन्य अधिकारियों के लिए एक गौरवपूर्ण पहचान होती है। यह मेडल सोने के रंग की धातु से बना होता है, जिस पर देवनागरी में “विशिष्ट सेवा” अंकित रहता है और यह एक पीले तथा हरे रंग की धारियों वाले रिबन से जुड़ा होता है।
विशिष्ट सेवा मेडल एक ऐसा सम्मान है जो यह दर्शाता है कि सेना में सेवा केवल युद्धभूमि में ही नहीं, बल्कि संगठन, नेतृत्व, योजना और प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यह उन अधिकारियों का मनोबल बढ़ाता है, जो पर्दे के पीछे रहकर राष्ट्र रक्षा और सेना के निर्माण में अपनी अमूल्य भूमिका निभाते हैं। यह मेडल न केवल व्यक्तिगत गौरव का प्रतीक है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है, जो उन्हें यह सिखाता है कि अनुशासन, निष्ठा और उत्कृष्टता किसी भी सेवा क्षेत्र में सम्मान का मार्ग प्रशस्त कर सकती है
उत्तम युद्ध सेवा मेडल
उत्तम युद्ध सेवा मेडल भारत सरकार द्वारा भारतीय सशस्त्र बलों के उन अधिकारियों को प्रदान किया जाने वाला एक विशिष्ट सैन्य सम्मान है जिन्होंने युद्ध, संघर्ष या सैन्य अभियान के दौरान असाधारण सेवा और नेतृत्व का प्रदर्शन किया हो। यह पुरस्कार विशेष रूप से युद्धकालीन परिस्थितियों में उन वरिष्ठ अधिकारियों को दिया जाता है जिनके रणनीतिक कौशल, सैन्य योजना और संचालन ने पूरे मिशन या युद्ध अभियान की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। यह मेडल युद्ध क्षेत्र में विशिष्ट सेवा को सम्मानित करने वाला उच्च श्रेणी का पुरस्कार है।
इस पुरस्कार की स्थापना भारत सरकार द्वारा २६ जनवरी १९८० को की गई थी। यह उन सैन्य अधिकारियों को दिया जाता है जिन्होंने युद्ध, संघर्ष, आतंकवाद विरोधी अभियानों या सीमावर्ती तनाव जैसी स्थितियों में अद्वितीय कार्यक्षमता और कर्तव्यपरायणता का परिचय दिया हो। यह मेडल विशेष रूप से उच्च स्तर के संचालन में शामिल अधिकारियों को दिया जाता है, जैसे कि कोर कमांडर, डिविजनल कमांडर या अन्य उच्च रणनीतिक पदों पर कार्यरत अधिकारी, जिनकी सेवा का प्रभाव युद्ध की दिशा और परिणाम पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता हो।
उत्तम युद्ध सेवा मेडल कांस्य धातु से बना एक गोलाकार पदक होता है। इस पर एक ओर भारत का राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ अंकित होता है और दूसरी ओर देवनागरी लिपि में “उत्तम युद्ध सेवा मेडल” लिखा होता है। यह मेडल एक पीले रंग के रिबन से जुड़ा होता है, जिसमें बीच में एक लाल पट्टी होती है — यह रंग संयोजन वीरता, समर्पण और युद्धकालीन योगदान का प्रतीक माना जाता है।
इस पुरस्कार का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत वीरता को नहीं, बल्कि नेतृत्व, योजना और सामरिक सूझबूझ को भी मान्यता देना है। उत्तम युद्ध सेवा मेडल प्राप्त करना किसी भी सैन्य अधिकारी के लिए न केवल सम्मान की बात होती है, बल्कि यह उसकी प्रशासनिक क्षमता, सैन्य ज्ञान और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए निभाई गई जिम्मेदारी की भी सार्वजनिक मान्यता है। यह पुरस्कार भारतीय सशस्त्र बलों की उस परंपरा का प्रतीक है जो युद्ध और संकट के समय नेतृत्व की भूमिका को सर्वोच्च मानती है, और ऐसे अधिकारियों को राष्ट्र के सामने आदर्श रूप में प्रस्तुत करती है जिन्होंने अपने कर्तव्य से राष्ट्र का मान बढ़ाया है।
परम विशिष्ट सेवा मेडल
परम विशिष्ट सेवा मेडल भारत सरकार द्वारा भारतीय सशस्त्र बलों के उन वरिष्ठ अधिकारियों को प्रदान किया जाने वाला एक सर्वोच्च शांतिकालीन सेवा सम्मान है, जिन्होंने दीर्घकाल तक असाधारण, विशिष्ट और उल्लेखनीय सेवाएं प्रदान की हों। यह पुरस्कार विशेष रूप से उन अधिकारियों को दिया जाता है जिनकी सेवा न केवल उनके दायित्वों की पूर्ति में उत्कृष्ट रही हो, बल्कि जिनका नेतृत्व, नीति निर्माण, प्रशासनिक क्षमता और संगठनात्मक योगदान संपूर्ण सैन्य बल के लिए प्रेरणादायक और मार्गदर्शक रहा हो।
इस पुरस्कार की स्थापना भारत सरकार द्वारा २६ जनवरी १९६० को की गई थी। इसे भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना के उन वरिष्ठतम अधिकारियों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने अपने पूरे सैन्य करियर में अनुकरणीय प्रतिबद्धता, उच्च नैतिक मानकों और प्रभावशाली नेतृत्व का प्रदर्शन किया हो। यह मेडल शांतिकाल में प्रदान किया जाता है और इसका उद्देश्य उन व्यक्तियों को सम्मानित करना है जो सैन्य सेवा के विभिन्न क्षेत्रों में दीर्घकालीन और उल्लेखनीय योगदान देकर सैन्य संरचना को सुदृढ़ करते हैं।
परम विशिष्ट सेवा मेडल एक गोलाकार चांदी का पदक होता है, जिस पर एक ओर भारत का राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ अंकित होता है और दूसरी ओर “परम विशिष्ट सेवा मेडल” शब्द देवनागरी लिपि में उत्कीर्ण होते हैं। यह पदक नीले रंग के रिबन से जुड़ा होता है, जिसमें बीच में एक सुनहरी पीली पट्टी होती है। यह रंग संयोजन उत्कृष्टता, गरिमा और सेवा के उच्च आदर्शों का प्रतीक माना जाता है।
यह पुरस्कार राष्ट्रपति द्वारा गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रदान किया जाता है और यह भारतीय सशस्त्र बलों में सर्वोच्च सम्मान की श्रेणी में आता है। यह न केवल उस अधिकारी के लिए व्यक्तिगत गौरव का प्रतीक होता है, बल्कि यह समस्त सैन्य समुदाय के लिए एक प्रेरणास्त्रोत भी बनता है। यह मेडल यह दर्शाता है कि सेवा केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि नेतृत्व, नीति, प्रशिक्षण, रणनीति और समर्पण के माध्यम से सेना के हर अंग को मजबूती देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह सम्मान उन अधिकारियों को श्रद्धांजलि है जिन्होंने अपने जीवन के वर्षों राष्ट्रसेवा और सैन्य गरिमा की उन्नति के लिए समर्पित किए हैं।
सर्वोत्कृष्ट युद्ध सेवा मेडल
सर्वोत्कृष्ट युद्ध सेवा मेडल भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जाने वाला एक अत्यंत प्रतिष्ठित सैन्य सम्मान है, जिसे युद्धकाल में अद्वितीय नेतृत्व, विशिष्ट रणनीतिक कौशल और उच्च स्तर की सेवा के लिए प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार भारतीय सशस्त्र बलों के उन वरिष्ठ अधिकारियों को दिया जाता है, जिनका योगदान किसी सैन्य अभियान या युद्ध की सफलता में निर्णायक और अत्यंत प्रभावशाली रहा हो। यह मेडल युद्ध क्षेत्र में दी गई “उत्कृष्टतम सेवा” के लिए प्रदान किया जाने वाला सर्वोच्च सेवा सम्मान है।
इस मेडल की स्थापना भारत सरकार द्वारा २६ जनवरी १९८० को की गई थी। यह मुख्यतः उन अधिकारियों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने सैन्य संचालन की योजना, समन्वय और नेतृत्व में ऐसा विशिष्ट योगदान दिया हो, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा, सामरिक उद्देश्य और सैन्य विजय को उल्लेखनीय रूप से बल मिला हो। यह पुरस्कार कोर कमांडर, डिवीजन कमांडर, या अन्य उच्च सैन्य पदों पर कार्यरत अधिकारियों को प्रदान किया जाता है, लेकिन यह किसी भी रैंक के अधिकारी को दिया जा सकता है यदि उसकी भूमिका अत्यंत विशिष्ट और असाधारण रही हो।
सर्वोत्कृष्ट युद्ध सेवा मेडल एक चांदी से निर्मित गोलाकार पदक होता है। इसमें एक ओर भारत का राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ अंकित होता है और दूसरी ओर देवनागरी लिपि में “सर्वोत्कृष्ट युद्ध सेवा मेडल” शब्द उत्कीर्ण होते हैं। यह मेडल पीले रंग के रिबन से जुड़ा होता है, जिसके बीच में दो लाल धारियाँ होती हैं – जो युद्धकाल में किए गए बलिदान, नेतृत्व और साहस का प्रतीक हैं।
यह सम्मान राष्ट्रपति द्वारा गणतंत्र दिवस या सैन्य समारोहों में प्रदान किया जाता है। सर्वोत्कृष्ट युद्ध सेवा मेडल प्राप्त करना भारतीय सशस्त्र बलों में सेवा कर रहे अधिकारियों के लिए सर्वोच्च गौरव की बात होती है। यह न केवल उस अधिकारी की कर्तव्यनिष्ठा और नेतृत्व को मान्यता देता है, बल्कि यह पूरे बल के लिए प्रेरणा और सम्मान का प्रतीक बनता है। यह मेडल यह दर्शाता है कि युद्ध केवल शौर्य का क्षेत्र नहीं होता, बल्कि रणनीति, दूरदर्शिता, अनुशासन और सेवा की उत्कृष्ट भावना का भी परिचायक होता है।
⚔️सेना, नौसेना और वायुसेना के व्यक्तिगत वीरता पदक⚔️
⚓ नौ सेना मेडल
नौ सेना मेडल भारत सरकार द्वारा भारतीय नौसेना के अधिकारियों और सैनिकों को उनके असाधारण कार्य, वीरता अथवा विशिष्ट सेवा के लिए प्रदान किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण सैन्य सम्मान है। यह पुरस्कार उन नौसैनिकों को दिया जाता है जिन्होंने अपने कर्तव्य पथ पर अद्वितीय साहस, अनुशासन और परिश्रम का परिचय दिया हो। यह मेडल शांति काल और युद्ध काल दोनों परिस्थितियों में प्रदान किया जा सकता है। युद्ध काल में यह शौर्य और वीरता के कार्यों के लिए दिया जाता है जबकि शांति काल में यह उत्कृष्ट और दीर्घकालिक सेवा के लिए सम्मान स्वरूप प्रदान किया जाता है।
इस पुरस्कार की स्थापना भारत सरकार द्वारा १७ जून १९६० को की गई थी। यह मेडल मुख्य रूप से भारतीय नौसेना के अधिकारियों, नाविकों और अन्य स्टाफ को उन कार्यों के लिए दिया जाता है जो न केवल सैन्य दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि राष्ट्र की सेवा में अनुकरणीय उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं। यह मेडल उन सैनिकों के मनोबल को ऊँचा उठाने का कार्य करता है जो समुद्री सीमाओं की रक्षा, समुद्री अभियानों, मानवीय राहत कार्यों या तकनीकी सेवाओं में अद्वितीय समर्पण के साथ कार्यरत होते हैं।
नौ सेना मेडल एक सुंदर चांदी जैसे रंग का पदक होता है, जिसकी एक ओर अशोक स्तंभ की आकृति अंकित होती है और दूसरी ओर देवनागरी में “नौ सेना मेडल” लिखा होता है। यह मेडल गहरे नीले रंग के रिबन से बंधा होता है जिसमें बीच में एक सफेद पट्टी होती है। यह रंग संयोजन समुद्र की गहराई, शांति और दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है। यह पदक उन सैनिकों को जीवन भर गर्व के साथ धारण करने की अनुमति होती है, जो इसे प्राप्त करते हैं।
इस सम्मान के साथ किसी प्रकार की नकद राशि या भत्ता सामान्य रूप से नहीं जुड़ा होता, लेकिन इसका महत्व सैनिकों के आत्मसम्मान, उनके सेवा जीवन और देश के लिए किए गए योगदान की मान्यता में अत्यंत बड़ा होता है। नौ सेना मेडल एक ऐसा सम्मान है जो केवल वीरता का नहीं, बल्कि समर्पण, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा का भी प्रतीक है। यह भारतीय नौसेना की उस संस्कृति को दर्शाता है जो हर परिस्थिति में राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानती है।
🛫 वायु सेना मेडल
वायु सेना मेडल भारतीय वायु सेना के उन सैनिकों को प्रदान किया जाने वाला एक विशिष्ट सैन्य सम्मान है जिन्होंने शौर्य, साहस या असाधारण सेवा का प्रदर्शन किया हो। यह सम्मान युद्धकाल और शांतिकाल दोनों स्थितियों में प्रदान किया जा सकता है। यह पुरस्कार वायु सेना के उन सदस्यों को दिया जाता है जिन्होंने उड़ान के दौरान या अन्य सैन्य कार्यों में अद्वितीय दक्षता, बहादुरी और जिम्मेदारी का परिचय दिया हो।
इस मेडल की स्थापना भारत सरकार द्वारा १७ जून १९६० को की गई थी। यह मेडल युद्धक्षेत्र में साहसिक कार्यों के लिए और शांतिकाल में विशिष्ट सेवाओं के लिए दिया जाता है। पहले यह केवल शांतिकालीन सेवा के लिए आरक्षित था, लेकिन १९९१ के बाद से इसे युद्धकालीन वीरता के लिए भी दिया जाने लगा है। इस सम्मान को पाने वालों में पायलट, तकनीकी अधिकारी और अन्य विमानन या जमीनी अभियानों से जुड़े अधिकारी शामिल हो सकते हैं।
वायु सेना मेडल प्राप्त करने वाले सैनिकों की सेवाएं देश के लिए अत्यंत प्रेरणादायक होती हैं। इस पुरस्कार में किसी प्रकार की नकद राशि नहीं दी जाती, लेकिन यह एक अत्यंत सम्मानजनक पदक होता है जो वर्दी पर गर्व से धारण किया जाता है। यह मेडल चांदी के रंग का होता है, जिसके एक ओर अशोक स्तंभ की आकृति अंकित रहती है और दूसरी ओर हिंदी व अंग्रेज़ी में “वायु सेना मेडल” लिखा होता है। यह मेडल नीले, सफेद और हल्के नीले रंग के रिबन से जुड़ा होता है, जो भारतीय वायु सेना के रंगों का प्रतिनिधित्व करता है।
यह सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह भारतीय वायु सेना के भीतर अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और उत्कृष्टता की परंपरा को भी दर्शाता है। इस पुरस्कार को प्राप्त करना एक सैनिक के लिए गर्व और सम्मान की बात होती है, जो उसकी सेवा की ऊँचाई को रेखांकित करता है। वायु सेना मेडल हमारे राष्ट्र के उन नायकों का प्रतीक है जो बिना किसी प्रचार के, अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा और साहस के साथ करते हैं।
🪖⚔️सेना मेडल
सेना मेडल भारत सरकार द्वारा भारतीय थल सेना के अधिकारियों, जूनियर कमीशंड अधिकारियों और सैनिकों को उनकी वीरता, साहस या विशिष्ट सेवा के लिए प्रदान किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण सैन्य सम्मान है। यह पुरस्कार उन लोगों को दिया जाता है जिन्होंने युद्धकाल या शांतिकाल के दौरान असाधारण साहस, निर्भीकता या अनुकरणीय सेवा का प्रदर्शन किया हो। यह सम्मान न केवल युद्धभूमि में दिखाई गई बहादुरी के लिए दिया जाता है, बल्कि ऐसी स्थितियों में भी जब सैनिकों ने जान की परवाह किए बिना किसी मिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया हो।
सेना मेडल की स्थापना भारत सरकार द्वारा १७ जून १९६० को की गई थी। यह पुरस्कार भारतीय सेना के उन सदस्यों को भी प्रदान किया जाता है जिन्होंने आपदा प्रबंधन, आतंकवाद विरोधी अभियानों या अन्य जोखिमपूर्ण स्थितियों में उत्कृष्ट नेतृत्व, तत्परता और समर्पण का परिचय दिया हो। युद्धकाल में यह पुरस्कार वीरता के लिए तथा शांतिकाल में विशिष्ट सेवाओं के लिए प्रदान किया जाता है।
सेना मेडल एक गोलाकार धातु का पदक होता है, जो सामान्यतः चांदी के रंग का होता है। इस पर एक ओर भारत का राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ अंकित होता है, और दूसरी ओर देवनागरी में “सेना मेडल” लिखा होता है। यह मेडल एक गहरे लाल और हरे रंग के रिबन से बंधा होता है जो साहस और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इस पदक को गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसरों पर राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है।
इस सम्मान को पाने वाले सैनिकों के लिए यह मेडल न केवल उनके साहस और सेवाभाव की पहचान होता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनता है। यह पुरस्कार भारतीय सेना के उस गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है जिसमें निष्ठा, कर्तव्य और राष्ट्रसेवा को सर्वोच्च माना गया है। सेना मेडल एक ऐसा गौरव है जिसे प्राप्त करना प्रत्येक सैनिक के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जाता है।
🥇युद्ध सेवा मेडल
न०-161515 के० एम०सी०पी०ओ० इन्द्र सिंह ओझा नेवी, मायरमेनी नाग-2016
आईसी0-63379 के0 कर्नल प्रदीप सिंह सौन, 42 आज जेटी- रडाक-2021
मैन्सन-इन-डिस्पैच
न0-6573510 हव0 मथुरा देत्त, ए०एस०सी०, डाबरी - शिलिंग-1952
ई0ई0-59099 मेजर भूपेन्द्र सिंह, सिगनल, जाजरदेवल–1966
जे0सी0-21480 ना० सुबे० राम सिंह, 4 कुमाँऊ, दोबाट-चौबाटी-1966
न0-4141513 सिपाही होशियार सिंह, 8 कुमाँऊ, लिन्थ्यूड़ा-1966
न0-6609108 सिपाही चंचल सिंह, ए०एस०सी० (एम०टी०) बलकोट-थरकोट-1971
जे0सी0-224255 ऑ0 कैप्टन मोहन सिंह, 7 कुमाँऊ, कालिका–धारचूला-1991
जे०सी०-212707 ऑ० कैप्टन किशन सिंह 9 कुमाँऊ, हनेरा-गंगोलीहाट
न0-2200936 हव० रमेश चन्द्र. 22 आसाम राईफल्स बड़ाबे-2003
न0-2103035 रा० मैन० राजेन्द्र प्रसाद पंत. 21 आसाम राईफल्स बुडेरा-बेरीनाग-2004
न0-4174854 हव० भूपेन्द्र सिंह, 6 कुमाँऊ, चुपडाखेत-मगीचौरा 2005
आई0सी0-56223 कर्नल सी०पी०एस० खाती 4/4 जी०आर०, जी०आई० सी० रोड पिथी०-2005
आई०सी०-63441 ले० कर्नल मनोज सिंह 2 डोगरा कृष्णापुरी-पिथौ०-2015
न0-4194971 नायक आनन्द सिंह, 17 कुमाँऊ, दुन्टा कण्डारीछीना-2018
न0-4191240 हवा चंचल सिंह 16 कुमाँऊ, बाटुला रसईपाटा-2018
न0-13627163 नायक बलवन्त सिंह 3 पैरा बोराबुगा-2019
न0-10406977 सिपाही राजेन्द्र सिंह, 114 टी०ए० जाट बटालियन, बडेना-चहज-2019
जे0सी0-9236 सुबे0 करम सिंह, असम राइफल्स, चिटगल-1946
जे0सी0-3131755 ना0 सुबे० खीम सिंह, जाट रेजी०, नैनी-सैनी-1948
जे०सी०-511207 ना० सुबे वाली चन्द्र बी०ई०जी० तेरी-मुरमुनी-1971
न0-8002086 ला० नायक रेवाधर, पैरा रेजी० भटगाँव, खेतीखान-1971
ले0 कर्नल अमर सिंह खत्री, कुमाँऊ रेजी०, काटली-भड़कटिया-1971
न0-4173209 ला० नायक राजेन्द्र सिंह, कुमाँऊ रेजी०, डांगीगाँव-बेरीनाग-1991
न0-13620195 ला० नायक रेवाधर जोशी, पैरा रेजी०, किथोली-लोहाघाट-2005
जे0सी0-282464 ना० सुबे० ललित मोहन चन्द, 278 फील्ड रेजी० बड़ालू-2020
न0-4203766 नायक नारायण सिंह रावत, 17 कुमाँऊ, चमाली-पिथौ0-2021
न0-4201982 ला0नायक कमलेश पन्त, 16 कुमाँऊ, अगॉव डांगटी, पिथौ0-2021
25
पी०वी० एस०एम०
ले० कर्नल जी०एस० रावत, कुमाँऊ रेजी०, देवलथल-1976
आई०सी०-11837 ले० जनरल चन्द्र शेखर कुमांऊ रेजी०, पगन्ना-बिषाड़-1987
ए० वी० एस०एम०
ब्रिगे० बिक्रम सिंह, जी०आर०, घन्टाकरण-पिथौ०-1962
आई० सी०-6318 ब्रिगे० परमानन्द जी०आर०, घन्टाकरण-पिथौ०-1975
आई० सी०-19196 मे० जनरल के०एन० भट्ट, ए०ई०सी०, तोली-गुरना-2003
वी० एस०एम०
जे०सी०-14031 ऑ० लेप्टीनैन्ट आई०डी० छेत्री, जी०आ०, चिपछिया-बिसुनाखान-1971
जे०सी०-135484 ना० सुबे० खुशाल सिंह, पैरा रेजी०, ड्योढार-शिलिंग-1979
न0-230390 जे०डब्लू०ओ० जे०बी० चन्द एयरफोर्स, बरङ-थल-1986
न0-8020521 हव० भवान सिंह कुमाँऊ रेजी०, मैसकोट नाथनी-1987
जे०सी०-220109 जु० मेजर देर्ट पन्द्र 3 पैरा नेड़ा-पिथौ०-1989
आई० सी०-30357 मे० जनरल वी०के० भट्ट इन्जिनियर्स घन्टाकरण-पिथी०-1994
आई०सी०-39084 मे० जनरल लव विक्रम चन्द्र सिगनल जी०आई० सी० रोड पिथी०-2007
एम०आर-04803 बिग्रे० हरीश चन्द्र पाठक, ए०एम०सी० लछिमा-पिथी०-2012
आई० सी०-54894 कर्नल एस०डी० उपाध्याय 316 फील्ड रेजी कप्यूरी-मौतज्ञ थाप-2013
आई० सी०-51574 कनीन दिगविजय सिंह बसेड़ा 5 जी०आर० भण्डारीगीव-देवलथल-2014
आई० सी०-582241 कत पृथ्वीराज सिंह रावल जीआर टकाना रोड-2016
आई० सी०-4071 बिग्रे० सुरेन्द्र मेहता जे०एस०ए० बमटीगाँव बरकोट-2018
सेना मैडल (डिस्टींग्यूस्ट)
न0-4150754 ला० हवा चन्द्र सिंह, कुमॉऊ रेजी०, मेल्टा-बॉस-1980
जे०सी०-46866 सुबे० पुष्कर सिंह कुमाँऊ रेजी०, कानरी-नैनी-सैनी-1983
जे०सी०-111555 सुबे० पूर्णानन्द, आर्टी मरसोली-शिलिंग-1984
न0-4166240 डव० पूरन राम, 19 कुमाँऊ तायल-बुगाछीना-1988
आई० सी०-30337 मे० जनरल वी०के० भट्ट, इन्जिनियर्स, घन्टाकरण-पिथी०-2000
एम०आर.-04095 ले० कर्नल एच०एस० रावत, ए०एम०सी०. देवलथल-2000
न०-4186779 ला नायक मदन मोहन, कुमाँऊ रेजी०, बगडीहाट-2003
आई०सी०-35122 बिग्रेडियर वी०एस० चौहान 21 माउन्टेन बिग्रेड चमू-2004
न०-4185082 नायक आनन्द ड कन्याल कुमाँऊ रेजी०, पॉरडू-2004
आई० सी०-42360 बिग्रेडियर कवीन्द्र सिंह सिख लाईट, जावापानी-2014
आई० सी०-61342 ले० कर्नल संजय सिंह कार्की पैरा रेजी० बोंगाड़-पौड्डू-2029
न0-4197755 नायक नारायण सिद्ध कुमाँऊ स्काउट कनार-बरम-2020
इन समस्त वीरता पुरस्कार प्राप्त वीरों को समर्पित हमारी ओर से विनम्र salutations, जिनकी अपार साहस, निष्ठा और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना ने राष्ट्र को गौरवांवित किया है। इन वीर सैनिकों ने संकट और संघर्ष की घड़ी में अपने अद्वितीय पराक्रम से न केवल शत्रु का सामना किया, बल्कि देश की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर वीरता की अमिट मिसाल स्थापित की। इनका शौर्य आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है और राष्ट्र के प्रति उनकी सेवा सदैव स्मरणीय रहेगी। उनके बलिदान और समर्पण को शब्दों में बांधना संभव नहीं, किंतु हमारा कृतज्ञ राष्ट्र सदैव उनके अद्वितीय योगदान को श्रद्धा, सम्मान और गर्व के साथ स्मरण करता रहेगा।
