अर्जुन पुरस्कार

अर्जुन पुरस्कार भारत सरकार द्वारा वर्ष 1961 में प्रारंभ किया गया था। यह पुरस्कार उन खिलाड़ियों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया हो और खेल भावना व अनुशासन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया हो। इस पुरस्कार का नाम महाभारत के महान धनुर्धर अर्जुन के नाम पर रखा गया है, जो समर्पण, निष्ठा और परिश्रम के प्रतीक माने जाते हैं।

अर्जुन पुरस्कार का मुख्य उद्देश्य भारत के युवाओं को खेलों की ओर प्रेरित करना और खिलाड़ियों के बेहतरीन प्रदर्शन को सार्वजनिक रूप से मान्यता देना है। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष विभिन्न खेलों से चयनित खिलाड़ियों को दिया जाता है। पहले यह केवल ओलंपिक खेलों तक सीमित था, लेकिन समय के साथ इसमें गैर-ओलंपिक खेल, पारंपरिक भारतीय खेल और दिव्यांग खिलाड़ियों के खेल भी शामिल कर लिए गए।

इस पुरस्कार के अंतर्गत खिलाड़ी को अर्जुन की प्रतिमा वाली कांस्य की मूर्ति, एक प्रशस्ति पत्र, एक प्रमाण पत्र और 15 लाख रुपये की नकद राशि दी जाती है। यह राशि समय-समय पर सरकार द्वारा संशोधित की जा सकती है। अर्जुन पुरस्कार के लिए चयन प्रक्रिया बहुत पारदर्शी होती है। खेल मंत्रालय द्वारा गठित एक चयन समिति विभिन्न खेल संगठनों, राष्ट्रीय खेल महासंघों और भारतीय ओलंपिक संघ से प्राप्त नामांकनों के आधार पर खिलाड़ियों का चयन करती है। चयन में खिलाड़ी के पिछले चार वर्षों के प्रदर्शन, खेल भावना, अनुशासन, नेतृत्व और योगदान को ध्यान में रखा जाता है।

हालांकि यह पुरस्कार मुख्य रूप से सक्रिय खिलाड़ियों को दिया जाता है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में सेवानिवृत्त खिलाड़ियों को भी प्रदान किया गया है, विशेषकर जब उनका योगदान अनुकरणीय रहा हो। इस पुरस्कार को व्यक्तिगत खेलों, टीम खेलों, मल्लखंभ, कबड्डी, खो-खो जैसे पारंपरिक भारतीय खेलों और दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए आयोजित खेलों में भी दिया जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह पुरस्कार समावेशिता और विविधता को बढ़ावा देता है।

अर्जुन पुरस्कार प्राप्त करने वाले खिलाड़ी समाज में युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बनते हैं। यह पुरस्कार न केवल खिलाड़ियों को व्यक्तिगत गौरव प्रदान करता है, बल्कि उन्हें अपने खेल में लगातार उत्कृष्टता बनाए रखने हेतु भी प्रेरित करता है। इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले कई महान खिलाड़ी हुए हैं, जैसे पी.टी. उषा, सचिन तेंदुलकर, साइना नेहवाल, मेरी कॉम, अभिनव बिंद्रा, बजरंग पूनिया, पी.वी. सिंधु और नीरज चोपड़ा आदि।

अर्जुन पुरस्कार के साथ अन्य खेल पुरस्कार जैसे द्रोणाचार्य पुरस्कार, ध्यानचंद पुरस्कार और मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार भी दिए जाते हैं। इन पुरस्कारों के माध्यम से भारत सरकार खेलों के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले खिलाड़ियों, कोचों और वरिष्ठजनों को सम्मानित करती है। अर्जुन पुरस्कार केवल एक सम्मान नहीं है, बल्कि यह भारतीय खेल संस्कृति की समृद्धि, खिलाड़ियों के संघर्ष और उनके समर्पण की सार्वजनिक स्वीकृति भी है। यह हर उस भारतीय खिलाड़ी के लिए प्रेरणास्रोत है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन करना चाहता है।

प्राप्तकर्ताओं के नाम

🔖 श्री हरिश्चंद्र रावत, पर्वतारोहण, अर्जुन पुरस्कार – १९६५ पद्मश्री – १९६६ मुनस्यारी, पिथौरागढ़
🔖 ना. सुबे. हरि दत्त कापड़ी, बास्केटबॉल, अर्जुन पुरस्कार – १९६९, लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार उत्तराखंड सरकार द्वारा – २०१४ भाटकोट, पिथौरागढ़
🔖 श्रीमती चंद्रप्रभा ऐतवाल, पर्वतारोहण अर्जुन पुरस्कार – १९८१ पद्मश्री – १९९२ धारचूला, पिथौरागढ़
🔖 कैप्टन सुरेंद्र सिंह वल्दिया, नौकायन अर्जुन पुरस्कार – १९९७ पौंण, पिथौरागढ़

अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित हमारे भारतीय रक्षा बलों के उन वीर सपूतों को कोटिशः नमन, जिन्होंने राष्ट्र की सेवा न केवल रणभूमि में बल्कि खेल के मैदान में भी अपनी प्रतिभा और पराक्रम से गौरवान्वित किया। वे योद्धा जिनके कंधों पर देश की सुरक्षा का भार है, वही जब खेल जगत में भी उत्कृष्टता की मिसाल बनते हैं, तो यह दोहरी प्रेरणा का प्रतीक बन जाता है। उनके साहस, अनुशासन और समर्पण ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत माता के सपूत हर मोर्चे पर अव्वल हैं – चाहे वह सीमा हो या प्रतियोगिता का मंच।

इन वीर जवानों ने अपनी सैन्य सेवा के साथ-साथ खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर यह दर्शाया है कि सच्चा देशभक्त हर क्षेत्र में देश का नाम ऊँचा करता है। इनका प्रशिक्षण, आत्मबल और अदम्य इच्छाशक्ति खेलों में भी उनकी सफलता का आधार बने। उनका संघर्ष और समर्पण आज की युवा पीढ़ी के लिए एक अमूल्य प्रेरणा है, जो उन्हें राष्ट्रहित के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने की दिशा दिखाता है।

इन बहादुर खिलाड़ियों ने यह प्रमाणित किया है कि देशभक्ति केवल वर्दी पहन कर ही नहीं, बल्कि हर कार्य में श्रेष्ठता से भी प्रकट की जा सकती है। खेलों में उनके द्वारा अर्जित उपलब्धियाँ, न केवल व्यक्तिगत गौरव का विषय हैं, बल्कि वे राष्ट्र की प्रतिष्ठा और गौरव का भी प्रतीक हैं। भारतवर्ष उनके इस योगदान को सदा स्मरण रखेगा और उनकी उपलब्धियों से प्रेरणा लेता रहेगा।

इन योद्धाओं को हमारा शत-शत वंदन, जिन्होंने भारत माता की सेवा में अपने जीवन को समर्पित करते हुए खेलों में भी अपना अद्वितीय योगदान दिया। वे हमारे राष्ट्र के गौरव हैं, जिनकी वीरता और प्रतिभा को शब्दों में बाँधना असंभव है। उनकी उपलब्धियाँ इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेंगी और उनकी गाथा आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।

द्रोणाचार्य अवार्ड

द्रोणाचार्य पुरस्कार भारत सरकार द्वारा उन उत्कृष्ट खेल प्रशिक्षकों को प्रदान किया जाने वाला एक प्रतिष्ठित सम्मान है, जिन्होंने खिलाड़ियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। यह पुरस्कार उन कोचों को दिया जाता है जिनकी प्रशिक्षण पद्धतियाँ, समर्पण और मार्गदर्शन ने खिलाड़ियों के प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार लाया हो। यह पुरस्कार उनके वर्षों के परिश्रम, रणनीतिक कौशल और खेल के प्रति निष्ठा का सरकारी स्तर पर मान्यता देने का माध्यम है।

इस पुरस्कार की स्थापना वर्ष 1985 में की गई थी। इसका नाम महाभारत के महान गुरु द्रोणाचार्य के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने अर्जुन जैसे वीर योद्धा को युद्धकला में निपुण बनाया था। यह नाम कोचों की भूमिका को गुरुत्व प्रदान करता है और उन्हें खिलाड़ी के निर्माण में एक मार्गदर्शक और प्रेरक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रत्येक वर्ष 29 अगस्त को, हॉकी के महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की जयंती के अवसर पर आयोजित ‘राष्ट्रीय खेल दिवस’ के दिन राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार उन कोचों को दिया जाता है जिन्होंने पिछले चार वर्षों में खिलाड़ियों को उत्कृष्ट उपलब्धियाँ दिलवाई हों, अथवा जिनका आजीवन योगदान खेल प्रशिक्षण में रहा हो।

इस पुरस्कार में एक प्रशस्ति पत्र, एक स्मृति चिह्न और नकद धनराशि प्रदान की जाती है। समय-समय पर इस पुरस्कार की राशि में वृद्धि की गई है ताकि कोचों को प्रोत्साहन और सम्मान दोनों प्राप्त हो सके। यह कोचों के आत्मबल और योगदान को सरकारी मान्यता देने का प्रमाण है।

द्रोणाचार्य पुरस्कार को प्राप्त करने वाले कोचों को न केवल खेल जगत में उच्च सम्मान प्राप्त होता है, बल्कि वे भविष्य की पीढ़ियों के लिए आदर्श भी बनते हैं। उनके अनुभव और प्रशिक्षण शैली को अन्य कोचों और खेल संस्थानों में भी अपनाया जाता है, जिससे खेल संस्कृति को मजबूती मिलती है।

यह पुरस्कार केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है, यह खेलों के प्रति कोचों के समर्पण, अनुशासन और धैर्य का भी प्रतीक है। यह उन सभी गुरुओं को सम्मानित करने का प्रयास है जिन्होंने परदे के पीछे रहकर खिलाड़ियों को ऊँचाइयों तक पहुँचाया। यह पुरस्कार भारतीय खेल प्रणाली में कोचों की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करता है और उन्हें देश के लिए गौरवशाली योगदान देने हेतु प्रेरित करता है।

🔖 श्रीमती हंसा मनराल, भारोत्तोलन, द्रोणाचार्य पुरस्कार – २००१ पिथौरागढ़

उत्तराखंड खेल रत्न

उत्तराखंड खेल रत्न पुरस्कार उत्तराखंड सरकार द्वारा राज्य के खिलाड़ियों को खेल के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए प्रदान किया जाने वाला एक राज्य स्तरीय सर्वोच्च खेल सम्मान है। यह पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर पर दिए जाने वाले “मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार” की तर्ज पर बनाया गया है, लेकिन इसका दायरा उत्तराखंड राज्य तक सीमित है।

इस पुरस्कार का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड राज्य के उन खिलाड़ियों को सम्मानित करना है जिन्होंने राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की हों। यह खिलाड़ियों को सम्मान देकर उनकी प्रेरणा व उत्साह को बनाए रखने का कार्य करता है।

इस पुरस्कार की शुरुआत उत्तराखंड राज्य बनने के बाद राज्य सरकार द्वारा की गई थी, ताकि राज्य के खिलाड़ियों को प्रोत्साहित किया जा सके और उनके योगदान को सरकारी मान्यता मिल सके।

इस पुरस्कार के लिए वही खिलाड़ी पात्र होते हैं जो उत्तराखंड राज्य के निवासी हों और जिन्होंने राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भाग लेकर स्वर्ण, रजत या कांस्य पदक प्राप्त किया हो। खिलाड़ी की उपलब्धि राज्य और राष्ट्र के गौरव को बढ़ाने वाली होनी चाहिए।

इस पुरस्कार में एक प्रशस्ति पत्र, एक स्मृति चिन्ह (ट्रॉफी), और एक निश्चित नकद पुरस्कार दिया जाता है। यह राशि समय और सरकारी नीति के अनुसार बदलती रहती है, सामान्यतः ₹१ लाख या उससे अधिक होती है।

पुरस्कार चयन के लिए राज्य खेल विभाग द्वारा एक समिति का गठन किया जाता है। खिलाड़ी के प्रदर्शन, योग्यता और खेल भावना को ध्यान में रखते हुए नामों का चयन होता है। अंतिम चयन उत्तराखंड सरकार द्वारा अनुमोदन के बाद घोषित किया जाता है।

यह पुरस्कार हर वर्ष उत्तराखंड के राज्य स्तरीय खेल दिवस या किसी विशेष आयोजन में मुख्यमंत्री या राज्यपाल द्वारा प्रदान किया जाता है। कई बार यह पुरस्कार लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड के साथ भी दिया जाता है।

उत्तराखंड खेल रत्न पुरस्कार प्राप्त करने वाले कुछ प्रमुख खिलाड़ियों में सूबेदार त्रिलोक सिंह बसेड़ा (फुटबॉल – २०१४), सीमा बिष्ट (महिला हॉकी), तथा अन्य विभिन्न खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले युवा खिलाड़ी शामिल हैं।

उत्तराखंड खेल रत्न पुरस्कार न केवल एक खिलाड़ी की उपलब्धियों को मान्यता देने का माध्यम है, बल्कि यह अन्य खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनता है। यह बताता है कि राज्य सरकार खिलाड़ियों के योगदान को पहचानती है और उन्हें और ऊँचाइयाँ छूने के लिए प्रेरित करती है।

🔖सुबेo त्रिलोक सिंह बसेड़ा, फ़ुटबॉल (आयन बॉल ऑफ़ इंडिया) उत्तराखंड खेल रत्न – २०१४ भंडारीगांव, देवलथल, पिथौरागढ़

देश के सभी खेल पुरस्कार प्राप्त वीर सैनिकों और खिलाड़ियों को हृदय से नमन, जिन्होंने अपनी अथक मेहनत, अनुशासन और समर्पण से न केवल खेल के मैदान में विजय ध्वज फहराया, बल्कि देश की सेवा में अपने जीवन का हर क्षण अर्पित किया। ये बहादुर कंधे न केवल सीमाओं की रक्षा करते हैं, बल्कि मैदान में अपने साहस, परिश्रम और दृढ़ निश्चय से भारत का गौरव भी बढ़ाते हैं। उनके संघर्ष, तपस्या और राष्ट्र के प्रति प्रेम को शब्दों में समेटना असंभव है। ऐसे समर्पित योद्धाओं को यह देश सदैव सम्मान और गर्व की दृष्टि से देखता रहेगा।